MithilaLive > समाचार
साइबर कैफे को लेकर लापरवाह है पुलिस
05/16/2008 01:54:31 PM

गाजियाबाद [फरमान अली]। नियम भी हैं, कानून भी हैं, नहीं है तो अमल करने की इच्छा और करवाने की चाहत। फिर चाहे मामला देश की सुरक्षा से ही क्यों न जुड़ा हो। जी हां, हम बात कर रहे हैं जनपद में सैकड़ों की तादाद में चल रहे साइबर कैफे की। सैकड़ों इसलिए क्योंकि पुलिस-प्रशासन के पास रिकार्ड नहीं है कि कितने साइबर कैफे हैं।

अंधी दौड़ व रुपये कमाने की होड़ में साइबर कैफे चलाने वालों को इतनी भी फुरसत नहीं है कि उनके कंप्यूटर को जो व्यक्ति इस्तेमाल कर रहा है, उसकी क्या पहचान है, वह क्या करना चाहता है। इनकी इसी लापरवाही के चलते आज देश की सुरक्षा को ही खतरा बन गया है। पूरी दुनिया को आपस में जोड़ने वाली इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी का बुद्धिजीवी लोग जहां सदुपयोग कर रहे हैं, वहीं साइबर कैफे का संचालन करने वाले लोगों की लापरवाही का आतंकी गुट भी फायदा उठा रहे हैं।

जयपुर में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट हो या लाल किला कांड। सभी बडे़ विस्फोट कांड में आतंकियों ने बखूबी आईटी का दुरुपयोग किया है। जब-जब दुरुपयोग हुआ है, तब-तब कुछ दिन के लिए पुलिस, प्रशासन सक्रिय दिखाई देते हैं लेकिन बाद में सब कुछ पुराने ढर्रे पर ही आ जाता है।

दरअसल, पूरा मामला उस इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट का है, जोकि पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। इस एक्ट को समझने व लागू कराने में कहीं अधिकारी अपना दामन बचाते नजर आते हैं तो कही कैफे संचालक इससे पूरी तरह अनभिज्ञता जताते हैं। कानून में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि एक कैफे के संचालन में किस प्रकार की अनुमति की आवश्यकता है। मगर इस बात का साफ तौर पर जिक्र है कि अगर किसी प्रकार का कोई क्राइम किसी कैफे से संचालित होता है तो उसके लिए संबंधित कैफे संचालक पूरी तरह से जिम्मेदार है। यदि वह पकड़ में आता है तो वह तब तक जिम्मेदारी से नहीं बच सकता, जब तक कि वह यह साबित न कर दे कि कैफे का जो दुरुपयोग हुआ, वह उसकी जानकारी में नहीं था।

वरिष्ठ अधिवक्ता राम अवतार गुप्ता कहते हैं कि इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 की धारा 97 में यह प्रावधान है कि साइबर कैफे के माध्यम से यदि कोई गलत सूचना दे दी जाती है तो इसके लिए साइबर कैफे का संचालक पूरी तरह से जिम्मेदार है। यदि इस तरह की कोई बात पकड़ में आती है तो उसे यह बताना होगा कि जिस व्यक्ति ने दुरुपयोग किया है, वह उसकी जानकारी में था। यदि नहीं था तो उसे यह बात साबित करनी होगी।

गुप्ता का यह भी कहना है कि इसमें प्रावधान यह भी है कि जो व्यक्ति साइबर कैफे का इस्तेमाल करा रहा है और जो कर रहा है, दोनों के बीच एक नॉन डिस्कलोजर एग्रीमेंट होना जरूरी है। ताकि यह सिद्ध हो सके कि जो व्यक्ति साइबर कैफे का इस्तेमाल कर रहा है, वह कराने वाला जानता है। यदि दोनों के बीच कोई नॉन डिस्क्लोजर एग्रीमेंट नहीं है तो साइबर कैफे के संचालक को अपना सिस्टम इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। यह सब प्रावधान सुरक्षा के मद्देनजर ही किए गए हैं।

गुप्ता बताते हैं कि नियम जो हैं सो हैं, लेकिन कॉमन सेंस यह कहता है कि साइबर कैफे चलाने वाले लोगों को सुरक्षा के मद्देनजर उसके सिस्टम को इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति का कम से कम पहचान पत्र देखना चाहिए और रजिस्टर में उसका नाम व पता दर्ज करना चाहिए। ताकि जरूरत पड़ने पर संबंधित व्यक्ति तक पुलिस व अन्य सुरक्षा एजेंसियों को पहुंचने में आसानी हो सके।

अपनी राय भॆजॆं | संपादक कॊ पत्र लिखॆं | मित्र कॊ बतायॆं

 

और भी

Editor Pick's

bulletमिथिलाक विकास
bulletबिहार और बिहारी एक नजर
bulletमिथिलालाइव : एक वर्ष
bulletदियॆ कॆ निचॆ अनधॆरा हॊता है

 

|

More At Editor Pick's

 

करियर

AP

 

मिशन BPSC सामान्य‌ अधय्यन

सामान्य अधय्यन किसी भी लॊक सॆवा आयॊग द्वारा आयॊजीत परीक्षा की रीढ की हड्डी हॊती...

वर्ष 2008 : नौकरियॊं की भरमार

जासूसी रोमांचक रोजगार

मैथिली कविता

bulletसब सँ सुन्‍दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम

bulletहमर आशानन्‍द भाई

 

|

और भी...

 

Advertise

 

 

Feed Back  -   Tell Your Friend - Terms Of Use- Privacy Policy About Us  -  Contact Us  - Careers -Advertise With Us
© Adarsh Internet Pvt. Ltd. Benipatti Madhubani All Right & Trade Mark  Reserved info@mithilalive.com  Reg No BST-00875362