मिथिलालाइव
साहित्य
 
MithilaLive >Sahitya >>कविता
मॉ मिथिले त कनिते रहती  प्रवीण झा,  
 
मॉं मिथिले त कनिते रहती, जाबए नै करब सब मिली हुंकार
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत, सब मिली के होउ तैयार ।
घर-घर जरै छै धू-धू के आगि, तैयो सब जाइ छै मिथिला के त्‍यागी,
माई के ममता के पैर सॅ कुचलि क, छोडि जाउ नै अहॉ अपन घर-द्वारि ।
 
बाढि रूपी दानव अबैछ हर साल, विनाशलीला सॅ करैत पूरा मि‍थिला के बेहाल ।
मॉ मिथिला क उठै छथि चित्‍कार, जनमानस में मचि जाइत अछि हाहाकार,
दारूण दशा इ मिथिला के देखी क, सूतल रहै अछि प्रांतक सरकार ।
सामग्री राहतक गटकि क नेता सभ होइछ मालामाल ।
एहि दानव सभक त्रास सॅ मॉ मिथिले भ गेली कंगाल ।
 
के साजिश क दबौलक मिथिलाक अधिकार ?
की मातृद्रोही नहि अछि अपन मिथिलेक कर्णधार ?
जमाना बदलि क भ गेल छैक नवीन, किया मिथिला अछि एखनो साधन विहीन ?
मिथिलाक नेता सॅ हमरा जवाब चाही, तथाकथित विकासक हमरा हिसाब चाही ।
पॉंच साल पर छलै अपन दरश देखौने, फुसियाहा छलै केहन भाषण सुनौने ।
अलग मिथिला राज्‍य बनायब, घर-घर में खुशहाली लायब, जौ अहॉ हमरा पार्टी के जिताएब
-         से कहि क ओ ठकबा भ गेल फरार ।
 
ल-ल के वोटे समेटै टा नोटे, मॉ मैथिली के पहुंचाबै टा चोटे,
मिथिला के संतान बेईमान बडका, करू एकरा सब के अहॉ बहिष्‍कार ।
की थिक इ उचित जे परदेश जा  क मात्र मिथिला के कोसी ?
की नै इ उचित जे संगठित भ हम सब आब मिथिला लेल सोची ?
धन्‍य छथि ओ मैथिल नहि जिनका अपन संस्‍कृति पर नाज,
अपन समृद्ध भाषा बाजए में जिनका होई छनि एखनहु बड लाज ।
 
बंगाली हुए वा मराठी, मद्रासी हुए वा गुजराती,
स्‍वयं निज भाषा पर कियो नै करै छै प्रहार ।
एहन सुकर्म क क अपन दामन के बनाउ नै अहॉ दागदार ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक पतन हेतु स्‍वयं नै बनु अहॉ जिम्‍मेवार ।
मातृभूमिक लेल जे काज नै आबए, ओ जिनगी के थिक शत-शत धिक्‍कार ।
 
मॉ मिथिला पुकारि रहल छथि, अश्रुपूरित नेत्र सॅ निहारि रहल छथि ।
अपन भाषा ओ संस्‍कृतिक करू अभिमान, तखनहि भेटत विदेशो में मान ।
कटि क अपन माटी सॅ, के पओलक अछि एखन तक सम्‍मान ?
किया बनब आन भाषा के दास, कान में अमृत घोरैछ अपन मैथिलीक मिठास ।
चलू निज धाम, करू प्रस्‍थान, आब नै हेतै मिथिलाक अपमान ।
 
कर्ज बहुत छैन मातृभूमि के सब पर, निज माटी के करू सब मिली नमस्‍कार ।
लिय प्रतिज्ञा हाथ उठा क, मॉ मिथिला के करब हम सब उद्धार ।
अपन श्‍वास सॅ अहॉ गिरि के खसाउ, पैरक धमक सॅ जग के हिलाऊ ।
करू भैरव नाद आ नभ के गुंजाऊ, मिथिलाक खंडित गौरव के सब मिली क वापस लाऊ ।
सहलौ बहुत, आब नै सहब हम सब तिरस्‍कार,
याचना ओ प्रार्थना सॅ नै भेटल एखन तक, आब धरू अहॉ सब तरूवारि (तलवार)
सौम्य रूप मैथिलक दॆखलक ऎखन तक, रौद्र रुप आब दॆखत संसार |
 
उग्र पथ पर आब बढि क अहॉ सब, छीनू अपन अतिक्रमित अधिकार ।
मॉ मिथिले त कनिते रहती जाएब नै करब हम सब हुंकार,
अधिकार त बलिदाने सॅ भेटत सब मिली क होऊ तैयार ।।

मैथिली कविता ( प्रवीण झा )

स्‍वर्ग सॅ सुन्‍दर मिथिलाधाम
मंडन, अयाची, राजा जनक के गाम।
जाहि ठाम‌ उगना बनला महादेव विद्यापति केर जानि यौ ।।
तेरी याद
याद आती है मुझको तेरी वो अदाऍं ।
चॉंद सा इक चेहरा, जुल्‍फों की वो घटाऍं ।

प्रस्‍तुति प्रवीण झा pkjpatna@gmail.com      मजॆदार चुटकुलॆ दुसरा पॆज

 

Feed Back  -   Refer To Friend - Terms Of Use- Privacy Policy About Us  -  Contact Us  - Careers -Advertise With Us
© 2007 Adarsh Internet Pvt. Ltd. Benipatti Madhubani All Right Reserved info@mithilalive.com