पर्यटन और तीर्थाटन में बुनियादी अंतर यह है कि
पर्यटन या तो शुद्ध घुमक्कड़ी के भाव से किया जाता है और उसमें स्थान का
महत्व नहीं है, घूमने का महत्व है और घूमने से अधिक फक्कड़पन के साथ रमने
का महत्व है। या पर्यटन का अर्थ घूमना है, जो शुद्ध भोग वृत्ति से होता
है, मौज लेने के लिए लोग रमणीय स्थानों पर घूमने जोते हैं या मंडलियों
में व्यावसायिक समुदाय घुमाने ले जाते हैं।
तीर्थाटन का शुद्ध उद्देश्य अपने को अकिंचन बनाकर ऐसे
स्थानों पर जाना है, जहां हजारों लोग जा चुके हैं और वहां स्नान करके,
ध्यान करके, पूजा करके अपने को कुछ नया अनुभव कर चुके हैं। सच्चा
तीर्थयात्री केवल स्थान की यात्रा नहीं करता, स्थान से जुड़े हुए तपस्वी
लोगों के साथ सत्संग भी करता है।
हमारे साहित्य में सबसे पहले तीर्थयात्रा का विस्तृत विवरण महाभारत में
मिलता है, जहां पर युधिष्ठिर ने वनवास का उपयोग तीर्थभ्रमण के लिए किया
और वहीं पर भारत के पुराने तीर्थो के बारे में सबसे पहला परिचय मिलता है।
इसके पहले रामायण में भी कई तीर्थयात्राओं का वर्णन है, पर युधिष्ठिर ने
भाइयों और द्रौपदी के साथ पूरे भारत के तीर्थो की यात्रा की। तीर्थयात्रा
कोई यात्रा नहीं होती, वह तो एक भाव है, जिसमें आदमी अपने को पूर्णरूप से
विसर्जित करना चाहता है, खोना चाहता है और किसी नदी-संगम या सागर-संगम या
सरोवर में डुबकी लगाकर अपनी क्षुद्र सीमाओं के पार जाना चाहता है।
तीर्थयात्राओं ने भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में बड़ी महत्वपूर्ण
भूमिका निभायी है, क्योंकि भारत के तीर्थ चारों दिशाओं में व्याप्त हैं-
चाहें चारों धाम हो (बद्रीनाथ, जगन्नाथ, रामेश्वर और द्वारिका), चाहे
मोक्ष देने वाली सात पुरियां हों (अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कॉची,
उज्जयिनी और द्वारिका) , चाहे नदियों के उद्गमों की यात्रा हो (गंगोत्री,
जमुनोत्री, नासिक, अमरकंटक और मानसरोवर), चाहे सागर-संगम-यात्रा हो (गंगासागर,
कन्याकुमारी और प्रभास)। ये सभी यात्राएं एक कोने से दूसरे कोने तक इस
तरह से जाती हैं कि आदमी अनुभव करता है कि सर्वत्र एक ही तरह की पवित्रता
की धड़कन है, एक ही तरह पराये को अपनाने का भाव है, एक ही तरह घोर से घोर
व्यावसायिकता के बीच आत्मतुष्टि है कि तीर्थयात्रा का कष्ट सफल हुआ।
तीर्थयात्री को इस कष्ट का फल अपने आसपास के लोगों के स्नेह और आदर से
भरपूर मिलता है। ऐसी कष्टकर यात्रा के लिए जो निकलता था, वह सबसे विदा
लेकर निकलता था, क्योंकि बहुत से लोग लौट ही नहीं पाते थे। इस प्रकार
तीर्थयात्रा के लिए निकलना परिवज्रन था। लोग गेरुआ पहनते थे या कम से कम
गेरुआ वस्त्र सिर पर बांधकर निकलते थे, अपने नाते-रिश्तों को छोड़कर
समष्टि में मिलने के लिए निकलते थे।
बहुत व्यावसायिकता आने के बावजूद आज भी तीर्थयात्रा का भाव बना हुआ है।
जहां पर्यटक विश्राम गृह हैं और पहाड़ों की सैर के लिए जाने वाले लोग पूरी
तरह अपनी आमोद वृत्ति की पूर्ति चाहते हैं, वहीं तीर्थयात्री घनघोर शीत
में प्रयाग में छोटी-सी छोलदारी या छोटी-सी झोंपड़ी में पुआल बिछाकर या
कभी-कभी नंगी बालू पर खुले आसमान के नीचे सोते हुए रात काट देते हैं,
क्योंकि उन्हें भोर होते ही त्रिवेणी में डुबकी लगानी है और फिर साथ में
लाये हुए पाथेय का बहुत बड़ा अंश तो दान दे देना है और थोड़े से अंश से
अपना पेट भरकर प्रसन्न मन घर लौट जाना है, यही भाव रहता है।
वह व्रत लेकर रहता है कि जमीन पर सोयेंगे, एक समय सादा भोजन करेंगे और
जप-तप में समय बितायेंगे या दूसरे लोगों को भोजन करायेंगे। ऐसे
तीर्थयात्रियों की व्यवस्था अपने आप हो जाती है। उसके लिए कोई विशेष
उद्यम कोई नहीं करता और न कोई तीर्थयात्री विशेष सुविधा का चाहक ही होता
है।
आज सुविधाएं बहुत दूर तक बढ़ गयी हैं। बसें बद्रीनाथ, गंगोत्री तक पहुंचने
लगी हैं, पर सुविधाओं को तो आदमी घर पर ही छोड़कर चलता है और मानकर चलता
है कि तीर्थयात्रा एक ऊंचे उद्देश्य से की गयी तपस्या है। आज भी
तीर्थयात्रियों के लिए जितनी व्यवस्थाएं की गयी हैं, वे सब बहुत ही
अपर्याप्त हैं। 20-25 हजार लोगों के लिए तिनकों के महल बनते हैं और 50
करोड़ से ज्यादा खर्च का हिसाब बैठता है। कुंभ के अवसर पर प्रयाग में एक
करोड़ आदमी एकत्रित होते हैं। कई दिनों तक 25 लाख से ज्यादा लोगों की भीड़
रहती है। तब भी उनके ऊपर इसका छोटा-सा हिस्सा ही व्यय होता है।
तीर्थयात्री का भाव भोक्ता का भाव नहीं है। तीर्थयात्रा ऊबे हुए मन से नहीं
की जाती कि मन नहीं लग रहा है, तो कैसे मन बहलायें। तीर्थयात्रा की जाती
है अत्यंत उत्सुक मन से, बड़ी साध वाले मन से कि वर्षो के बाद हमारी
अभिलाषा पूरी हुई है कि हम चारों धाम कर आये। हम इतने ज्योतिर्लिगों का
दर्शन कर आये। वह बहुत साधारण बनकर निकलता है और अपनी सब पहचानों को घर
छोड़कर निकलता है। उसकी एक ही पहचान होती है कि वह तीर्थयात्री है। साथ
ही तीर्थयात्री अकेला नहीं है, उसके साथ विशाल जनसागर है। जब चित्रकूट
में कामदगिरि की परिक्रमा होती है, अयोध्या में 14 कोस की परिक्रमा होती
है, वृंदावन में 12 कोस की परिक्रमा होती है, काशी में 5 कोस की परिक्रमा
होती है, गोवर्धन की परिक्रमा होती है, तो लोग नंगे पांव स्नान करके सवेरे
निकल पड़ते हैं और बड़े उल्लास से गाते, कीर्तन करते चलते हैं। कहीं थकान
लगी तो कुछ खा-पी लिया। कहीं पड़ाव पड़ा तो कथा-वार्ता सुनते रहे।
ये परिक्रमाएं किसी स्थान की परिक्रमा नहीं नहीं होती, ये परिक्रमाएं आदमी
के अपने भीतर भी होती हैं, क्योंकि ये परिक्रमाएं करते समय वह अपने भीतर
और घुसता चला जाता है कि क्या ठाठ है, राव-रंक, बूढ़े-बच्चे, सब एक साथ
चल रहे हैं और इस रूप में चल रहे हैं कि कोई अगर थक रहा है, नीचे लुढ़क
रहा है तो उसको भी उठाते चलें, संभालते चलें। इसलिए यह परिक्रमा स्वयं के
उत्सर्ग की परिक्रमा होती है। इन परिक्रमाओं के ही कारण स्थान पवित्र हो
गये हैं, जहां पर हजारों वर्षो से लाख-लाख मनुष्य इसी पवित्र भाव से
नियमित रूप से आते हैं और अपनी क्षुद्रता को विशालता में परिणत करते हैं,
उस स्थान में अपने आप अपूर्व शक्ति आ जायेगी।
परिक्रमा एक साथ दिव्य पवित्रता को बोध है और लौकिक मंगलकामना का संकल्प
है। यह सही है कि अब परिक्रमा के साथ कुछ कामनाएं भी जुड़ने लगी हैं, पर
परिक्रमा का सही उद्देश्य निष्काम ही है। निष्काम अपूर्व तृप्ति पाना है,
क्योंकि उस तृप्ति के साथ चलने वाले दूसरे यात्री ही नहीं होते, उस तृप्ति
की सहभागी पूरी प्रकृति होती है, जिसके बीच में से यह परिक्रमा होती है।
तीर्थयात्रा भारतीय संस्कृति का बहुत बड़ा अंग है। यही मनुष्य को उसके
सहज रूप का बोध कराती है, यही उसे सबके साथ सहभागी बनाती है और यही उसके
छोटे दायरे को समाप्त करती है और यही संस्कृति को निरंतर गतिशील बनाती
है।
(लेखक का यह लेख इंद्रप्रस्थ प्रकाशन से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'रथयात्रा'
से लिया गया है।)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।