श्रीमद् भगवत गीता( हिन्दी
भाषा में अनुबाद - पँक्ज चन्द )
यदा यदा
हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
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श्रीमद् भगवत गीता के बहुत
से अनुवाद हैं ॥ किसी को कोई अच्छा लगता है, किसी को कोई ॥ संस्कृत सबको
नही आती इसलिये मैं कोशिश कर रहा हूँ सीधी हिन्दी में लिखने की ॥ भगवान
करें मैं ठीक ठीक लिख पाऊँ ॥ आप को प्रणाम है ॥ भगवान हम सब का भला
करें । ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥
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गीता कॆ बारॆ मॆं लॊगॊ कॆ विचार :- |
ख्वाजा दिल मुहम्मद जी
यह उरफ़ानी मज़मून संस्कृत के सात सौ श्लोकों में ब्यान किया गया है
। हर श्लोक माहरफ़त का रंगीन फ़ूल है . इन्हीम सात सौ फ़ूलों की माला
का नाम गीता है । यह माला किरोड़ों इन्सानों के हाथ पहुँच चुकी है ।
लेकिन ताहाल इसकी ताज़गी, इसकी ख़ुश्बू में कोई फ़र्क नहीं आया । यह
फ़ूल उस बाग़ से चुने गए हैं जिसका नाम गुलशन-ए बका है, जिसे आब-ए
हैयात ने सींचा है और जिस पर हुसन की उस मलिका का राज है जिसका नाम
हक़ीक़त है ।।
महात्मा गाँधी जी
जब-जब संकट पड़ते हैं, तब-तब संकट टलाने के लिए हम गीता के पास दौड़े
जाते हैं और उससे आश्वासन पाते हैं । हमें गीता को इस दृष्टि से पढ़ना
है ।वह हमारे लिए सद् गुरू रूप है, माता रूप है और हमें विश्वास रखना
चाहिये कि उसकी गोद में सिर रखने से हम सही सलामत रहेंगे । गीता के
द्वारा हम अपनी तमाम धार्मिक उलझनें सुलझावेंगे, उस विधी से जो रोज़
गीता का मनन करेगा, उसे नित्य नया आनन्द मिलेगा नये अर्थ प्राप्त होते
रहेंगे । ऐसी एक भी धार्मिक समस्या नहीं, जिसे गीता हल न कर सके ।।
संत ज्ञानेश्वर जी
गीता विवेक रूपी वृक्षों का एक अपूर्व बगीचा है । यह सब सुखों की
नींव है । सिद्धान्त रत्नों का भन्डार है । नवरसरूपी अमृत से भरा हुआ
समुद्र है । सब विद्यायों की मूल भूमि है । अशेष शास्त्रों का आश्रय
है । सब धर्मों की मातृभूमि है । सरस्वती के लावण्य-रत्नों का भन्डार
है । यह गीता ज्ञानामृत से भरी हुई गंगाजी है । विवेकरूपी क्षीरसागर
की नव-लक्ष्मी है ।।
श्री लोकमान्य तिलक
गीता में आत्मज्ञान के अनेक गूढ़ सिद्धान्त ऐसी प्रासादिक भाषा में
लिखे गये हैं कि वे बूढ़ों और बच्चों को एक समान सुगम हैं और इसमें
ज्ञानयुक्त भक्तिरस भी भरा पड़ा है । जिस ग्रन्थ में सनस्त वैदिक
धर्म का सार स्वयं श्रीकृष्ण भगवान् की वाणीसे संग्रहीत किया गया है,
उसकी योग्यता का वर्णन कैसे किया जाए ।।
स्वामी रामतीर्थ
बाबा, साँसारिक बुद्धि को सारथी बनाना दुःख ही दुःख पाना है । अब बात
सुनो --- फ़तह इसी में है कि अपनी मन रूपी बागडोर दे दो, दे दो उस
कृष्ण के हाथ, बस, कोई ख़तरा नहीं । वह इस सँसार रूपी कुरूक्षेत्र से
जय के साथ रथ ले ही निकलेगा ष रथ हाँकने में तो वे प्रसिद्ध उस्ताद
हैं, आवश्यकता है हरि को रथ, घोड़े और बागें सौंप कर पास बिठाने की,
अर्थात् उपासना की ।।
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